Swami Ramtirtha says, Joy is in giving

January 30, 2012 11:24 by anisha
  • वेदान्त आप से यह अंगीकार कराना चाहता है कि सुख मात्र देने में है, लेने अथवा भीख मांगने में नहीं।
  • वेदान्त दर्शन के प्रचार का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है इसे अपने आचरण में लाना – निर्लिप्त साक्षी के रूप में सब झंझटों से मुक्त होकर कर्म करो – सदा स्वतंत्र और निर्लिप्त रहो।
  • संपूर्ण स्वर्ग आपके भीतर है – संपूर्ण सुख का स्रोत आपके भीतर है – ऐसी स्थिति में अन्यत्र आनन्द को ढूंढना कितना अनुचित और असंगत है।
  • सांसारिक भोग-विलास की भूमि में बोये हुये बीज से अध्यात्मिक विकास का पौधा नहीं पनप सकता।
  • दैवी विधान यह है कि मनुष्य मन से आराम में, शांति में, एवं क्षोभ-रहित अवस्था में रहे और तन से सदा काम में लगा रहे।
  • अज्ञानवश तुम अपने को शरीर कहते हो प्रन्तु शरीर तुम हो नहीं, तुम अनन्त शक्ति हो, ईश्वर हो, नित्य और निर्विकार हो – तुम वही हो, उसे जानो और तुम फिर अपने को सारे संसार में और समस्त विश्व में ओत-प्रोत पाओगे।

~ स्वामी रामतीर्थ


 


Swami Ramtirtha says, Know that you are infinite, God

January 30, 2012 10:58 by anisha

शरीर से ऊपर उठो – समझो और अनुभव करो कि मैं अनन्त हूं – परमात्मा हूं, और इसलिये मुझ पर मनोविकार और लोभ भला कैसा प्रभाव डाल सकते हैं।

~ स्वामी रामतीर्थ


 


स्वामी रामतीर्थ के विचार, देश की शक्ति

January 30, 2012 10:46 by anisha

किसी देश की शक्ति छोटे विचारों के बड़े आदमियों से नहीं किन्तु बड़े विचारों के छोटे आदमियों से बढ़ती है।

~ स्वामी रामतीर्थ


 


Swami Ramtirtha’s quote on Brahman

January 30, 2012 10:40 by anisha

“ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है – नामरूपात्मक जगत मिथ्या है।”

~ स्वामी रामतीर्थ

Only Brahma is. This world with all its names and forms is not the absolute truth. (translated)


 


Swami Ramtirtha’s sayings

January 30, 2012 10:35 by anisha
  • सफलता का रहस्य है वेदान्त को व्यवहार में लाना। व्यावहारिक वेदान्त ही सफलता की कुंजी है।
  • तुम एक मात्र सत्य पर आरूढ़ हो – इस बात से भयभीत मत हो कि अधिकांश लोग तुम्हारे विरुद्ध हैं।
  • जिस चीज़ को स्वीकार करो या जिस धर्म पर विश्वास करो, उसकी निजी श्रेष्ठता के कारण से करो – स्वयं जांच पड़ताल करो – खूब छानबीन कर लो।
  • वेदान्त शब्द का सीधा-सादा अर्थ है परम तत्व। वह तत्व, वह सत्य तुम्हारी निजी वस्तु है। वह जैसी राम की है वैसी तुम्हारी है। वह तत्व किसी एक की सम्पत्ति नहीं परन्तु प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक वस्तु उस परम तत्व की है।
  • धर्म का सार तत्व है अपने ऊपर से पर्दे का उठाना अर्थात अपने आप का रहस्य जानना।
  • वेदान्त आपकी कामनाओं को छीन कर आप को दुखी नहीं बनाता, किन्तु वेदान्त आपसे इन इच्छाओं का सदुपयोग करने के लिये कहता है जिससे वे आधीन रहें। इच्छाओं द्वारा क्रूरतापूर्वक शासित होने के स्थान में वेदान्त आपको उनका शासक बनाना चाहता है।
  • सच्चे धर्म का मतलब ईश्वर शब्द का विश्वास करने की अपेक्षा भलाई पर अधिक विश्वास करना है।
  • प्रार्थना करना कुछ शब्दों को दुहराना नहीं है – प्रार्थना का अर्थ है परमात्मा का मनन और अनुभव करना।
  • भय और दण्ड से पाप कभी बंद नहीं होते।
  • सत्य तो वह है जो तीनों कालों में एक समान रहता है, जैसा कल था, वैसा ही आज है और वैसा ही सदा आगे रहेगा – किसी घटना विशेष से उनका संबंध नहीं जोड़ा जा सकता।

 


Swami Ramtirtha’s poem, I am what you are

January 30, 2012 10:14 by anisha

जो तू है सो मैं हूं, जो मैं हूं सो तू है।

न कुछ आरज़ू है, न कुछ जुस्तजू है॥

बसा राम मुझ में, मैं अब राम में हूं।

न इक है, न दो हैं, सदा तू ही तू है॥


 


स्वामी रामतीर्थ, एक परिचय

January 30, 2012 10:04 by anisha

स्वामी रामतीर्थ का जन्म २२ अक्तूबर १८७३ को पंजाब के गुजरानवाला ज़िले में हुआ था। जो अब पाकिस्तान में है। भारत में उस समय विदेशी साम्राज्य का बोल बाला था। सदियों की ग़ुलामी के कारण अज्ञानता, लाचारी, दरिद्रता ने देश में बुरी तरह घर कर रखा था। एक शायर ने उस समय के भारत को ‘लाश-बे-कफ़न’ की संज्ञा दी थी।

ऐसे वातावरण में स्वामी जी एक युगपुरुष के रूप में अवतरित हुये। मातृ विहीन बचपन का सादा, सात्विक जीवन व्यतीत करते हुये उन्होंने ज़िला स्कूल से एन्ट्रेन्स तथा पंजाब विश्वविद्यालय से १८९४ में एम. ए. की डिग्री सम्मान पूर्वक प्राप्त की। वहां भी सादगी का जीवन व्यतीत किया। उनकी कुशाग्र बुद्धि तथा स्वाभाविक सरलता से सभी प्रभावित थे। पंजाव सिविल सर्विस का प्रस्ताव ठुकराकर उन्होंहे शिक्षक बनना अधिक श्रेयस्कर समझा और गणित के प्रोफ़ेसर नियुक्त हुये। इसके साथ-साथ कृष्ण भक्ति, साधु सेवा उनके जीवन के मुख्य अंग थे। उसी बीच स्वामी विवेकानन्द तथा जगदगुरु शंकराचार्य से उनका संपर्क हुआ। १८९९ में उन्होंने सन्यास ग्रहण किया और हिमालय की ओर चले गये तथा उसके बाद देश विदेश भ्रमण – इस संदर्भ में जापान, अमेरिका मिश्र, इत्यादि की यात्रा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

अपने तैतींस वर्षीय जीवन में उन्होंने अपनी अमृतमयी वाणी के द्वारा देश में नया जीवन, नई चेतना का संचार किया – भारत ही नहीं, वरन समस्त विश्व में वेदान्त के संदेश का डंका बजा कर मानव जाति की भूली हुई संपदा (ब्रह्मविद्या) की स्मृति कराई। उनके उपदेशों ने समकालीन सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक विचार-धारा तथा मानव-मानव को नज़दीक लाने में चमत्कारी प्रभाव डाला। उनके विचारों की जो महत्ता तब थी आज भी है –और सदैव रहेगी, क्योंकि सत्य तो अमर और अपरिवर्तनीय है। सन १९०६ में दीपावली के दिन स्वामी जी गंगा माता की गोद में सदा के लिये विलीन हो गये।