…रोज़ तौबा को तोड़ता हूं मैं, रोज़ नीयत ख़राब होती है…
…हम पियें तो सवाब बनती है
हम अपनी शाम को जब नज़र-ए-जाम करते हैं
अदब से हमको सितारें सलाम करते हैं
गले लगाते हैं दुशमन को भी सरूर में हम
बहुत बुरें हैं मगर नेक काम करते हैं…
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